क्या हुआ है?
चीन और पाकिस्तान ने सितंबर 2026 में Pakistan-China Boundary Joint Commission को औपचारिक रूप से सक्रिय किया। इस आयोग की पहली बैठक इस्लामाबाद में 16-17 सितंबर को हुई। पाकिस्तान के मुताबिक इसका उद्देश्य सीमा प्रबंधन, संयुक्त सीमा सर्वेक्षण, लोगों और सामान की आवाजाही तथा सीमा से जुड़े सहयोग को बेहतर बनाना है। यह व्यवस्था मूल रूप से 2013 के एक सीमा प्रबंधन समझौते से जुड़ी है।
लेकिन भारत ने इस आयोग को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया।
भारत की आपत्ति क्या है?
भारत का मुख्य तर्क है कि जिस क्षेत्र को चीन और पाकिस्तान अपनी साझा सीमा के रूप में देख रहे हैं, उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा भारत के दावे वाले जम्मू-कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र से संबंधित है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत चीन-पाकिस्तान के बीच 1963 के तथाकथित सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं देता और उसे भारत के दृष्टिकोण से अवैध एवं अमान्य मानता है। भारत के अनुसार पाकिस्तान को उस भारतीय क्षेत्र के संबंध में किसी तीसरे देश के साथ समझौता करने का अधिकार नहीं है, जिस पर भारत पाकिस्तान का अवैध कब्जा मानता है।
विवाद की जड़ है 1963 का समझौता
1963 में पाकिस्तान और चीन के बीच एक सीमा समझौता हुआ था। इसके तहत पाकिस्तान ने शक्सगाम घाटी (Trans-Karakoram Tract) के लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चीन के साथ समझौते में शामिल किया।
भारत का आधिकारिक रुख है कि यह क्षेत्र तत्कालीन जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था और पाकिस्तान के कब्जे में होने के बावजूद वह भारत का क्षेत्र है। इसलिए भारत ने पाकिस्तान के इस क्षेत्र को चीन के साथ समझौते में शामिल करने को स्वीकार नहीं किया।
शक्सगाम घाटी क्यों महत्वपूर्ण है?
शक्सगाम घाटी काराकोरम क्षेत्र में स्थित है और चीन के शिनजियांग क्षेत्र तथा पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र के बीच आती है।
भारत के लिए यह मामला केवल सीमा प्रबंधन का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संप्रभुता और जम्मू-कश्मीर से जुड़े दावे का हिस्सा है।
इसी वजह से नई दिल्ली का कहना है कि पाकिस्तान और चीन इस क्षेत्र को लेकर कोई ऐसी नई व्यवस्था नहीं बना सकते जिसे भारत अपनी संप्रभुता के खिलाफ मानता है।
भारत ने आयोग को क्यों खारिज किया?
भारत की आपत्ति को मुख्य रूप से चार बिंदुओं में समझा जा सकता है:
1. भारत 1963 के समझौते को मान्यता नहीं देता
नई दिल्ली का कहना है कि 1963 का चीन-पाकिस्तान सीमा समझौता भारतीय क्षेत्र से संबंधित था और इसलिए भारत के लिए मान्य नहीं है।
2. पाकिस्तान को भारतीय क्षेत्र पर समझौता करने का अधिकार नहीं मानता
भारत के अनुसार पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र को लेकर पाकिस्तान किसी तीसरे देश के साथ ऐसी व्यवस्था नहीं कर सकता जो उस क्षेत्र की स्थिति को बदलने या कब्जे को वैध बनाने जैसी हो।
3. जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर भारत अपना दावा कायम रखता है
भारत ने दोहराया है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न एवं अविभाज्य हिस्से हैं।
4. CPEC भी इसी विवाद से जुड़ा है
भारत लंबे समय से China-Pakistan Economic Corridor (CPEC) पर भी आपत्ति जताता रहा है, क्योंकि इसका एक हिस्सा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है।
पाकिस्तान का क्या कहना है?
पाकिस्तान भारत की आपत्तियों को स्वीकार नहीं करता। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने 17 सितंबर को कहा कि 1963 का समझौता उसके अनुसार वैध है और भारत के दावों को उसने कानूनी रूप से अस्थिर बताया। पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर को विवादित क्षेत्र मानता है और उसके अंतिम समाधान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों तथा कश्मीरी लोगों की आकांक्षाओं से जोड़ता है।
क्या यह नया सीमा समझौता भारत की जमीन चीन को देने जैसा है?
ऐसा सीधे तौर पर कहना सही नहीं होगा।
2026 में जो कदम उठाया गया है, वह मुख्यतः Pakistan-China Boundary Joint Commission को operationalise करने और सीमा प्रबंधन तथा सहयोग के लिए उसका ढांचा सक्रिय करने से संबंधित है। इसकी पृष्ठभूमि 1963 के चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते और 2013 के सीमा प्रबंधन समझौते से जुड़ी है।
हालांकि भारत की चिंता यह है कि ऐसे तंत्र से उन क्षेत्रों पर चीन-पाकिस्तान की प्रशासनिक एवं बुनियादी ढांचे से जुड़ी गतिविधियां बढ़ सकती हैं, जिन्हें भारत अपना क्षेत्र मानता है।
निष्कर्ष
चीन-पाकिस्तान सीमा आयोग को लेकर भारत की आपत्ति का मूल कारण सीमा प्रबंधन नहीं, बल्कि उस सीमा की वैधता और संबंधित क्षेत्र पर संप्रभुता का विवाद है।
भारत 1963 के चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को मान्यता नहीं देता और कहता है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले भारतीय क्षेत्र से संबंधित किसी भी द्विपक्षीय व्यवस्था का भारत की संप्रभुता पर कोई असर नहीं पड़ सकता। वहीं पाकिस्तान और चीन अपने पुराने समझौतों को वैध मानते हुए सीमा सहयोग आगे बढ़ा रहे हैं।