आरक्षित सीटों के रोटेशन पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में बुधवार, 4 नवंबर 2026 को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों को अनिवार्य रूप से रोटेट करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे गलत नंबर डायल कर रहे हैं और उन्हें विरोध-प्रदर्शन करना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की, 'आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं, यह तो विरोध-प्रदर्शनों का दौर है। शायद आपको भी ऐसा ही करना चाहिए।'
याचिकाकर्ता के वकील ने जवाब दिया कि उनका विरोध करने का कोई इरादा नहीं है और उनका गला भी खराब है।
क्या है याचिकाकर्ता की मांग?
यह याचिका उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के कादीपुर विधानसभा क्षेत्र के एक मतदाता जगदीश सिंह ने दाखिल की है। उनका कहना है कि कादीपुर विधानसभा सीट 1952 के पहले चुनाव से लगातार अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रही है।
याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया कि सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद इस सीट का आरक्षण क्यों नहीं बदला गया। उनका दावा है कि लगातार आरक्षण बने रहने से कुछ सीमित परिवारों को ही इसका लाभ मिला है।
उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि संबंधित अधिकारियों को आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के लिए रोटेशन प्रणाली लागू करने पर विचार करने का निर्देश दिया जाए।
पंचायत चुनावों की तरह विधानसभा सीटों पर भी रोटेशन की मांग
याचिकाकर्ता ने अपनी दलील में कहा कि पंचायत और नगर निकाय चुनावों में आरक्षित सीटों के रोटेशन की व्यवस्था लागू है। इसी तरह संसद और राज्य विधानसभाओं की आरक्षित सीटों के लिए भी रोटेशन प्रणाली पर विचार किया जाना चाहिए।
उनका तर्क था कि लंबे समय तक किसी सीट को आरक्षित रखने से दूसरे समुदायों के उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने के अवसर सीमित हो जाते हैं। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 का भी हवाला दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि यह मान लेना उचित नहीं है कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता केवल जाति के आधार पर मतदान करते हैं। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि यह धारणा सही नहीं है कि बहुसंख्यक समुदाय के मतदाता हमेशा जाति या समुदाय के आधार पर ही वोट करेंगे।
उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी सीट के आरक्षित होने से मतदाता का मतदान करने का अधिकार प्रभावित नहीं होता।
'आपका मतदान का अधिकार पूरी तरह सुरक्षित'
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि मतदाता किसी भी समुदाय के उम्मीदवार को वोट देने के लिए स्वतंत्र हैं। आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र होने का अर्थ यह नहीं है कि मतदाता के मतदान के अधिकार पर कोई प्रतिबंध लग जाता है।
पीठ ने यह भी कहा कि चुनाव लड़ने का अधिकार किसी व्यक्ति को केवल एक निर्वाचन क्षेत्र तक सीमित नहीं करता। कोई उम्मीदवार अन्य सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों से भी चुनाव लड़ सकता है, बशर्ते वह संबंधित कानूनी शर्तें पूरी करता हो।
आरक्षित सीटों के रोटेशन पर आगे क्या?
इस मामले का मुख्य सवाल यह है कि क्या संसद और विधानसभा की आरक्षित सीटों के लिए भी पंचायत चुनावों की तरह नियमित रोटेशन प्रणाली लागू की जानी चाहिए।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में याचिकाकर्ता की मांग और उसके संवैधानिक तर्कों पर चर्चा हुई है। CJI की टिप्पणी को याचिका पर अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए। आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था और उसमें बदलाव का प्रश्न संवैधानिक तथा कानूनी प्रावधानों से जुड़ा है।
निष्कर्ष: आरक्षित सीटों के रोटेशन की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने चुनावी प्रतिनिधित्व, सामाजिक आरक्षण और मतदाताओं के अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल सामने रखे हैं। CJI की 'गलत नंबर डायल' वाली टिप्पणी सुनवाई के दौरान हल्के-फुल्के अंदाज में की गई थी, जबकि पीठ ने मामले के संवैधानिक पहलुओं पर भी अपनी टिप्पणियां दर्ज कीं।