दिल्ली में नवजात बच्चों की खरीद-फरोख्त का मामला
दिल्ली में नवजात बच्चों की कथित तस्करी से जुड़े एक अंतरराज्यीय गिरोह की जांच में कई गंभीर बातें सामने आई हैं। पुलिस के अनुसार, गिरोह गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से बच्चों को हासिल कर उन्हें निसंतान दंपतियों या बेटा चाहने वाले परिवारों को लाखों रुपये में बेचता था।
द टाइम्स ऑफ इंडिया की 27 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने इस मामले में 600 से अधिक पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है। इसमें 24 लोगों को आरोपी बनाया गया है, जिनमें 12 कथित खरीदार और रोहिणी के बेगमपुर स्थित निजी अस्पताल की संचालिका डॉक्टर भी शामिल हैं। जांच के दौरान नौ नवजात बच्चों को बचाए जाने की जानकारी दी गई है। आरोपियों के खिलाफ मानव तस्करी, आपराधिक साजिश और किशोर न्याय कानून के तहत धाराएं लगाई गई हैं। आरोपों पर अंतिम निर्णय अदालत करेगी।
फर्जी ग्राहक बनकर पुलिस ने खोला नेटवर्क
रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस को एक महिला के अलग-अलग नवजात बच्चों के साथ दिखाई देने की सूचना मिली थी। इसके बाद पुलिसकर्मियों ने संभावित खरीदार बनकर उससे संपर्क किया।
आरोप है कि महिला ने एक नवजात लड़के को पांच लाख रुपये में देने की बात कही और 20 हजार रुपये अग्रिम लिए। 5 जून को आरके आश्रम मेट्रो स्टेशन के पास बच्चे को सौंपने पहुंचने पर पुलिस ने कार्रवाई की और चार-पांच दिन के शिशु को सुरक्षित बरामद किया। इस कार्रवाई के बाद जांच निजी अस्पताल और अन्य कथित बिचौलियों तक पहुंची।
बच्चों के अलग-अलग दाम, लाखों रुपये में सौदे का आरोप
पुलिस जांच से जुड़ी पहले की रिपोर्टों में बच्चों के लिए अलग-अलग कीमतों का उल्लेख किया गया था। दैनिक जागरण के मुताबिक, कथित गिरोह नवजात बच्चियों को लगभग 3 से 4 लाख रुपये और लड़कों को 6 से 8 लाख रुपये में बेचता था। एक मामले में जुड़वां बच्चों के लिए नौ लाख रुपये का सौदा बताए जाने की भी रिपोर्ट है।
द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में पुलिस के हवाले से कहा गया कि कुछ नवजात बच्चों को लगभग 1.5 से 2 लाख रुपये में हासिल कर 6 से 8 लाख रुपये में बेचा जाता था। कुछ सौदों में रकम इससे अधिक होने का भी दावा किया गया।
फर्जी अस्पताल रिकॉर्ड से छिपाते थे असली पहचान
जांच के मुताबिक, गिरोह कथित तौर पर निजी अस्पताल का इस्तेमाल बच्चों को छिपाने और उनकी पहचान से जुड़े दस्तावेज तैयार करने के लिए करता था। आरोप है कि फर्जी भर्ती रिकॉर्ड, चिकित्सा दस्तावेज और डिलीवरी से जुड़े कागजात बनाकर बच्चों को खरीदारों का जैविक बच्चा दिखाने की कोशिश की जाती थी।
इससे अवैध खरीद-फरोख्त को सामान्य गोद लेने की प्रक्रिया जैसा दिखाया जा सके। पुलिस का आरोप है कि अस्पताल की संचालिका और नेटवर्क के अन्य सदस्य इस व्यवस्था में भूमिका निभाते थे।
जाति और अविवाहित माताओं को लेकर क्या है दावा?
आपके दिए गए शीर्षक में एजेंट के हवाले से दावा है कि अविवाहित लड़कियों की जाति के आधार पर बच्चों की कीमत तय होती थी और ब्राह्मण लड़की के बच्चे की बुकिंग तुरंत हो जाती थी। हालांकि, उपलब्ध प्रमुख समाचार रिपोर्टों और पुलिस जांच के प्रकाशित विवरणों में जाति के आधार पर कीमत तय होने की बात स्वतंत्र रूप से पुष्ट नहीं मिली।
इसी तरह, बैंक मैनेजर के साथ कथित सौदे का पूरा विवरण भी उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों से स्पष्ट नहीं हो सका। इसलिए इन बातों को फिलहाल जांच में प्रमाणित तथ्य के बजाय रिपोर्ट में किए गए दावे के रूप में ही देखना चाहिए।
कानूनी गोद लेने और बच्चे की खरीद-फरोख्त में अंतर
भारत में कानूनी गोद लेने की प्रक्रिया केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) और संबंधित नियमों के तहत संचालित होती है। इच्छुक अभिभावकों को आधिकारिक पोर्टल पर पंजीकरण करना होता है और प्रक्रिया निर्धारित कानूनी व्यवस्था के अनुसार पूरी की जाती है।
बच्चे को पैसे देकर हासिल करना, उसकी पहचान छिपाना या फर्जी जन्म दस्तावेज तैयार करना वैध गोद लेने की प्रक्रिया नहीं है।
जांच जारी, आरोपियों को दोषी साबित होना बाकी
दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में दर्ज आरोपों और जांच के निष्कर्षों का अदालत में परीक्षण होना बाकी है। इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल बच्चों के जैविक माता-पिता की पहचान, बच्चों को नेटवर्क तक पहुंचाने वाले लोगों की भूमिका और कथित खरीदारों की जानकारी को लेकर हैं।
निष्कर्ष:
दिल्ली के इस मामले ने नवजात बच्चों की कथित तस्करी और फर्जी गोद लेने के गंभीर आरोपों को सामने रखा है। पुलिस के मुताबिक, गिरोह बच्चों को लाखों रुपये में बेचने और उनकी पहचान छिपाने के लिए फर्जी अस्पताल रिकॉर्ड का इस्तेमाल करता था। जाति आधारित कीमतों और बैंक मैनेजर से जुड़ी डील जैसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि होने तक उन्हें सावधानी से प्रस्तुत करना जरूरी है।