वॉशिंगटन: अंतरिक्ष की दुनिया से एक बेहद रोमांचक खबर सामने आई है। वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के अपेक्षाकृत करीब स्थित एक नए एक्सोप्लैनेट की पहचान की है। यह ग्रह हमसे करीब 25 प्रकाश वर्ष दूर बताया जा रहा है। इसके आकार और अपने तारे के आसपास की स्थिति ने वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है।

इस तरह की खोज इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि पृथ्वी के करीब मौजूद छोटे और संभावित रूप से चट्टानी ग्रहों का अध्ययन वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद करता है कि दूसरे तारों के आसपास ग्रह कैसे बनते हैं और वहां जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियां मौजूद हो सकती हैं या नहीं।


25 प्रकाश वर्ष दूर है नया ग्रह

यह ग्रह एक अपेक्षाकृत छोटे और ठंडे रेड ड्वार्फ स्टार के आसपास चक्कर लगाता है। इसकी दूरी लगभग 25 प्रकाश वर्ष होने के कारण यह खगोलीय पैमाने पर हमारे नजदीकी ग्रह प्रणालियों में शामिल हो सकता है।

हालांकि 25 प्रकाश वर्ष सुनने में कम लग सकता है, लेकिन मौजूदा अंतरिक्ष तकनीक के हिसाब से यह दूरी बेहद विशाल है। एक प्रकाश वर्ष वह दूरी है, जिसे प्रकाश एक साल में तय करता है।


क्या वाकई पृथ्वी जैसी है ये दुनिया?

किसी ग्रह को सिर्फ आकार या अपने तारे से दूरी के आधार पर ‘दूसरी पृथ्वी’ कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। किसी ग्रह के रहने योग्य होने के लिए कई परिस्थितियां जरूरी होती हैं—जैसे तापमान, वायुमंडल, पानी की उपलब्धता और सतह की परिस्थितियां।

वैज्ञानिकों को यह पता लगाने के लिए ग्रह के वातावरण और रासायनिक संरचना का भी अध्ययन करना होगा। इसके लिए भविष्य में शक्तिशाली अंतरिक्ष दूरबीनों और स्पेक्ट्रोस्कोपिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।


वैज्ञानिक क्यों हैं उत्साहित?

पृथ्वी के करीब पाए जाने वाले छोटे एक्सोप्लैनेट वैज्ञानिकों के लिए खास महत्व रखते हैं। दूर स्थित ग्रहों की तुलना में अपेक्षाकृत नजदीकी ग्रहों से आने वाले संकेतों का अध्ययन करना कुछ मामलों में आसान हो सकता है।

अगर इस ग्रह के वातावरण के संकेत मिलते हैं, तो वैज्ञानिक यह जांच सकते हैं कि उसमें जलवाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन या अन्य रासायनिक तत्व मौजूद हैं या नहीं। हालांकि इनमें से किसी एक गैस की मौजूदगी को अपने आप में जीवन का प्रमाण नहीं माना जा सकता।


एक्सोप्लैनेट की खोज कैसे होती है?

वैज्ञानिक आमतौर पर एक्सोप्लैनेट खोजने के लिए कई तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। इनमें Transit Method और Radial Velocity Method प्रमुख हैं।

जब कोई ग्रह अपने तारे के सामने से गुजरता है तो तारे की चमक में बेहद मामूली गिरावट दर्ज की जा सकती है। इस बदलाव के आधार पर ग्रह की मौजूदगी का अनुमान लगाया जाता है।

वहीं, ग्रह का गुरुत्वाकर्षण अपने तारे को भी थोड़ा-सा हिलाता है। तारे की इस गति को मापकर वैज्ञानिक ग्रह के द्रव्यमान और कक्षा के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं।


अभी ‘एलियन लाइफ’ का कोई सबूत नहीं

इस खोज को लेकर सबसे जरूरी बात यह है कि पृथ्वी जैसा आकार या रहने योग्य क्षेत्र में मौजूद होना जीवन मिलने की गारंटी नहीं है। फिलहाल इस ग्रह पर किसी तरह के एलियन जीवन की पुष्टि नहीं हुई है।

वैज्ञानिकों के लिए अगला बड़ा कदम इसके वातावरण और सतह की परिस्थितियों के बारे में अधिक जानकारी हासिल करना होगा। अगर भविष्य के अवलोकनों में दिलचस्प रासायनिक संकेत मिलते हैं, तो यह ग्रह एक्सोप्लैनेट रिसर्च का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य बन सकता है।