Form-6 को लेकर आखिर विवाद क्या है?
भारत में Form-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी पात्र व्यक्ति का नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। हालिया विवाद उस ऑनलाइन Form-6 को लेकर है, जिसमें Special Intensive Revision यानी SIR के दौरान एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी।
इस अतिरिक्त घोषणा में आवेदक से यह बताने को कहा गया कि उसका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR के दौरान तैयार मतदाता सूची में था या नहीं। इसी अतिरिक्त जानकारी को लेकर सवाल उठे कि क्या चुनाव आयोग अपने स्तर पर Form-6 में ऐसी शर्त जोड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर को क्या कहा?
5 अक्टूबर को CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उसने Form-6 के किसी संशोधित संस्करण को मंजूरी नहीं दी है।
CJI ने यह भी कहा कि जब रिकॉर्ड अदालत के सामने आएगा तो वह देखना चाहती है कि किसने क्या संशोधन किया था। यही टिप्पणी इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।
इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को दोषी ठहरा दिया है। बल्कि अदालत अब यह जांचना चाहती है कि Form-6 में बदलाव वास्तव में हुआ था या नहीं, बदलाव किस स्तर पर हुआ और उसके लिए कानूनी अधिकार क्या था।
चुनाव आयोग ने पहले क्या कहा था?
विवाद इसलिए और गंभीर हुआ क्योंकि 26 सितंबर को चुनाव आयोग ने एक प्रेस नोट जारी कर कहा था कि SIR के लिए Form-6 से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है।
ECI ने यह भी स्पष्ट किया था कि SIR की अवधि में संबंधित घोषणा का इस्तेमाल होगा, जबकि SIR के बाहर Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित Form-6 इस्तेमाल किया जाएगा।
अब सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि आयोग के उस बयान में “Supreme Court द्वारा upheld” कहने का आधार क्या था।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने Form-6 में बदलाव को मंजूरी नहीं दी थी?
यही मौजूदा विवाद का केंद्रीय सवाल है।
सुप्रीम कोर्ट की 5 अक्टूबर की सुनवाई में CJI ने स्पष्ट किया कि किसी modified Form-6 को अदालत ने मंजूरी नहीं दी थी। अदालत अब संबंधित रिकॉर्ड देखना चाहती है।
इसलिए दो बातों को अलग-अलग समझना जरूरी है:
- बिहार SIR से संबंधित सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक अलग मुद्दा था।
- उसके बाद ऑनलाइन Form-6 में जो अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई, उसकी वैधता और अधिकार का सवाल अलग है।
रिपोर्टों के अनुसार, Form-6 में यह अतिरिक्त घोषणा बाद में जोड़ी गई थी। इसलिए अदालत अब रिकॉर्ड के आधार पर यह देखना चाहती है कि इसे किस प्रक्रिया के तहत लागू किया गया।
दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति भी क्यों महत्वपूर्ण है?
इस विवाद में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने Form-6 में बदलाव को लेकर आपत्ति दर्ज की थी।
उनका तर्क था कि Form-6 Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित है और इसमें बदलाव केवल ऑनलाइन पोर्टल में तकनीकी परिवर्तन करके नहीं किया जा सकता। इसके लिए संबंधित वैधानिक प्रक्रिया का पालन जरूरी हो सकता है।
अगर अदालत रिकॉर्ड की जांच के बाद यह पाती है कि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बिना वैधानिक Form-6 में बदलाव किया गया था, तो यह चुनाव आयोग के लिए गंभीर सवाल खड़ा कर सकता है।
क्या चुनाव आयोग 'फंस गया' है?
राजनीतिक भाषा में भले ही कहा जा रहा हो कि चुनाव आयोग “फंस गया”, लेकिन कानूनी तौर पर अभी ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
फिलहाल आयोग के सामने तीन बड़े सवाल हैं:
पहला— बदलाव किसने किया?
अगर Form-6 में वास्तव में बदलाव किया गया, तो उसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी या संस्था की थी?
दूसरा— कानूनी अधिकार क्या था?
क्या आयोग को अपने प्रशासनिक या तकनीकी अधिकार के तहत यह अतिरिक्त घोषणा जोड़ने की अनुमति थी या इसके लिए नियमों में औपचारिक संशोधन जरूरी था?
तीसरा— सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी का दावा किस आधार पर था?
अगर अदालत ने संशोधित Form-6 पर कोई आदेश नहीं दिया था, तो 26 सितंबर के ECI बयान में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संदर्भ किस अर्थ में दिया गया था?
इन सवालों के जवाब रिकॉर्ड सामने आने के बाद ज्यादा स्पष्ट होंगे।
क्या इससे SIR की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठ सकता है?
यह सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक और कानूनी सवालों में से एक है।
सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में बिहार SIR से जुड़े मामले में आयोग की कुछ शक्तियों को स्वीकार किया था, लेकिन साथ ही यह भी कहा था कि विशेष पुनरीक्षण के लिए आयोग की शक्ति असीमित नहीं है और प्रक्रिया मनमानी नहीं होनी चाहिए।
इसलिए Form-6 का विवाद केवल एक ऑनलाइन फॉर्म के बदलाव तक सीमित नहीं रह सकता। अगर अदालत यह पाती है कि किसी वैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार करके पात्र मतदाताओं के लिए अतिरिक्त बाधा बनाई गई, तो उसका असर SIR की प्रक्रिया से जुड़े व्यापक सवालों पर भी पड़ सकता है।
हालांकि, अभी ऐसा कोई न्यायिक निष्कर्ष नहीं आया है कि पूरी SIR प्रक्रिया अवैध है।
नए मतदाताओं पर क्या असर पड़ सकता है?
Form-6 मुख्य रूप से नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल होता है। इसलिए अतिरिक्त घोषणा का सबसे सीधा असर उन लोगों पर पड़ सकता है जो पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करा रहे हैं।
मसलन, यदि कोई व्यक्ति हाल ही में 18 वर्ष का हुआ है और पिछली SIR के समय वह मतदाता ही नहीं था, तो उसके लिए पिछली SIR की सूची में अपना नाम ढूंढना संभव नहीं होगा। ऐसे मामलों में माता-पिता या दादा-दादी से संबंधित जानकारी की आवश्यकता को लेकर सवाल उठे हैं।
यही वजह है कि विवाद केवल तकनीकी फॉर्म का नहीं बल्कि मतदाता बनने की प्रक्रिया और नागरिक के मतदान अधिकार तक पहुंच से भी जुड़ गया है।
ECI के पास क्या बचाव है?
चुनाव आयोग का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। आयोग ने कहा है कि उसने मूल वैधानिक Form-6 में बदलाव नहीं किया, बल्कि SIR के संदर्भ में एक अतिरिक्त declaration जोड़ी थी।
ECI का यह भी कहना है कि SIR समाप्त होने के बाद संबंधित राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में निर्धारित वैधानिक Form-6 का इस्तेमाल किया जाएगा। आयोग ने राहुल गांधी के आरोपों को भी “misleading” बताते हुए अपने पक्ष में स्पष्टीकरण दिया है।
इसलिए यह कहना कि “ECI ने Form-6 गैरकानूनी तरीके से बदल दिया” अभी अदालत द्वारा तय तथ्य नहीं है। यह एक आरोप और विवाद का विषय है, जिसकी न्यायिक जांच जारी है।
असली लड़ाई अब रिकॉर्ड पर होगी
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद अब सबसे अहम चीज ECI के मूल रिकॉर्ड होंगे।
अदालत यह देख सकती है कि:
- Form-6 में बदलाव का प्रस्ताव किसने रखा?
- किस बैठक में इस पर फैसला हुआ?
- क्या सभी चुनाव आयुक्तों की सहमति थी?
- क्या केंद्र सरकार या संबंधित नियमों में संशोधन की जरूरत थी?
- अतिरिक्त declaration किस कानूनी प्रावधान के तहत जोड़ी गई?
- और क्या सुप्रीम कोर्ट के किसी आदेश को इस बदलाव के समर्थन के रूप में सही तरीके से उद्धृत किया गया?
इन्हीं सवालों के जवाब तय करेंगे कि मामला केवल प्रशासनिक/तकनीकी स्पष्टीकरण तक सीमित रहता है या चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर संवैधानिक सवाल खड़े होते हैं।
निष्कर्ष: अभी फैसला बाकी है
Form-6 पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी चुनाव आयोग के लिए निश्चित रूप से असहज स्थिति पैदा करती है, क्योंकि अदालत ने खुद कहा है कि उसने संशोधित Form-6 को मंजूरी नहीं दी थी और रिकॉर्ड में यह देखना चाहती है कि बदलाव किसने किया।
लेकिन इस स्तर पर यह कहना कि “चुनाव आयोग फंस गया” या “ECI दोषी साबित हो गया” कानूनी रूप से सही नहीं होगा।
अभी मामला जांच के चरण में है। यदि रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि वैधानिक Form-6 में बिना उचित अधिकार या प्रक्रिया के बदलाव किया गया, तो आयोग के लिए गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं। दूसरी तरफ, अगर ECI यह साबित कर देता है कि यह केवल SIR के लिए वैध प्रशासनिक declaration थी और मूल Form-6 में कोई वैधानिक संशोधन नहीं किया गया, तो विवाद का स्वरूप अलग हो सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—Form-6 में बदलाव किसने किया और किस अधिकार के तहत किया? सुप्रीम कोर्ट की अगली कार्यवाही में इसी सवाल का जवाब महत्वपूर्ण होगा।