पित्त की थैली यानी Gallbladder लिवर के नीचे मौजूद एक छोटी थैली होती है, जिसमें पित्त (Bile) जमा रहता है। यही पित्त भोजन में मौजूद वसा को पचाने में मदद करता है। जब पित्त में मौजूद कुछ पदार्थ असंतुलित हो जाते हैं, तो छोटे-छोटे क्रिस्टल बन सकते हैं और समय के साथ यही क्रिस्टल कठोर होकर पित्त की पथरी का रूप ले सकते हैं।


पित्त की थैली में पथरी क्यों बनती है?

Gallstones बनने का एक कारण पित्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा ज्यादा होना है। जब पित्त इतनी मात्रा में कोलेस्ट्रॉल को घोल नहीं पाता, तो अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल क्रिस्टल बनाकर पथरी का रूप ले सकता है। कुछ मामलों में पित्त में बिलीरुबिन की अधिकता भी पथरी बनने में भूमिका निभा सकती है।

तेजी से वजन कम होना, मोटापा, गर्भावस्था, परिवार में Gallstones का इतिहास और कुछ अन्य स्वास्थ्य स्थितियां भी जोखिम बढ़ा सकती हैं।


Gallstones के लक्षण क्या हैं?

कई लोगों में पित्त की पथरी होने के बावजूद कोई लक्षण दिखाई नहीं देता। लेकिन अगर पथरी पित्त की नली को ब्लॉक कर दे, तो अचानक और तेज दर्द हो सकता है। इसके प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं: पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में तेज दर्द पेट के बीच या पसलियों के नीचे दर्द पीठ या कंधे तक दर्द पहुंचना मतली या उल्टी दर्द का कुछ मिनटों से लेकर कई घंटों तक रहना


कैसे होती है जांच?

  1. Gallstones की जांच के लिए डॉक्टर आमतौर पर Abdominal Ultrasound करवाते हैं। जरूरत पड़ने पर Blood Tests, CT Scan, HIDA Scan, MRCP या ERCP जैसी जांचों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।
  2. पित्त की पथरी का इलाज अगर पथरी है लेकिन कोई लक्षण नहीं हैं, तो कई मामलों में तत्काल इलाज की जरूरत नहीं होती। डॉक्टर स्थिति की निगरानी की सलाह दे सकते हैं।
  3. वहीं, बार-बार दर्द या पथरी से होने वाली जटिलताओं में Cholecystectomy यानी पित्त की थैली निकालने की सर्जरी प्रमुख इलाज है। यह अक्सर लैप्रोस्कोपिक तरीके से की जाती है। कुछ विशेष परिस्थितियों में दवाओं से पथरी घोलने की कोशिश भी की जा सकती है, लेकिन इसमें लंबा समय लग सकता है और पथरी दोबारा बनने की संभावना रहती है।
  4. तेज और लगातार पेट दर्द, बुखार/ठंड लगना या आंखों और त्वचा का पीला पड़ना हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए, क्योंकि ये गंभीर जटिलता के संकेत हो सकते हैं।

नोट: यह सामान्य स्वास्थ्य जानकारी है। पित्त की पथरी का इलाज उसकी संख्या, आकार, स्थान और लक्षणों के आधार पर डॉक्टर तय करते हैं।