IDBI बैंक के बाद सरकारी बैंकों में हिस्सेदारी घटाने की तैयारी
नई दिल्ली: केंद्र सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में अपनी हिस्सेदारी घटाने और बैंकिंग सेक्टर में सुधार की दिशा में नए कदम उठाने पर विचार कर रही है। 23 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सरकार चार सरकारी बैंकों में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 75% करने की योजना पर काम कर रही है। इसका उद्देश्य शेयर बाजार के न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता संबंधी नियमों का पालन करना है।
यह घटनाक्रम IDBI बैंक की 60.72% हिस्सेदारी बेचने के लिए कनाडा की Fairfax Financial Holdings से जुड़ी कंपनी को ₹52,878.08 करोड़ में रणनीतिक खरीदार के रूप में मंजूरी दिए जाने के बाद सामने आया है। हालांकि, IDBI बैंक का सौदा और अन्य बैंकों में प्रस्तावित हिस्सेदारी बिक्री अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
इन 4 सरकारी बैंकों में घट सकती है हिस्सेदारी
रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार जिन चार बैंकों में हिस्सेदारी घटाने पर विचार कर रही है, वे हैं:
1. सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया
सरकार के पास बैंक की 81.19% हिस्सेदारी है। इसे 75% तक लाने के लिए सरकार को अपनी कुछ हिस्सेदारी बेचनी पड़ सकती है।
2. यूको बैंक
यूको बैंक में सरकार की हिस्सेदारी 90.95% है। प्रस्तावित योजना के तहत सार्वजनिक निवेशकों के पास बैंक के अधिक शेयर पहुंच सकते हैं।
3. पंजाब एंड सिंध बैंक
इस बैंक में सरकारी हिस्सेदारी 93.85% है। इसे 75% तक लाने के लिए सरकार को हिस्सेदारी में उल्लेखनीय कमी करनी होगी।
4. इंडियन ओवरसीज बैंक
इंडियन ओवरसीज बैंक में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 92.44% है। प्रस्तावित बदलाव के तहत सरकार अपनी हिस्सेदारी घटाने पर विचार कर रही है।
ये हिस्सेदारी के आंकड़े प्रकाशित रिपोर्टों में दिए गए हैं। प्रस्तावित बिक्री की मात्रा, कीमत और तारीख को लेकर अंतिम आधिकारिक घोषणा अभी सामने नहीं आई है।
सरकार हिस्सेदारी क्यों घटाना चाहती है?
सरकार की इस योजना के पीछे प्रमुख कारण न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता के नियमों का पालन करना है। भारतीय शेयर बाजार के नियमों के अनुसार, सूचीबद्ध कंपनियों में सार्वजनिक शेयरधारिता निर्धारित न्यूनतम स्तर पर बनाए रखना आवश्यक होता है। सरकारी बैंकों को इस संबंध में कुछ समय के लिए छूट दी गई थी, जिसकी अवधि अगस्त 2026 में समाप्त होने की जानकारी रिपोर्टों में दी गई है।
सरकार ऑफर फॉर सेल (OFS) जैसे माध्यमों से अपनी हिस्सेदारी बेच सकती है। इस प्रक्रिया में शेयर बाजार के जरिए निवेशकों को सरकारी हिस्सेदारी खरीदने का अवसर मिलता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, हिस्सेदारी घटने से इन बैंकों में सार्वजनिक शेयरों की उपलब्धता और कारोबार में भी बढ़ोतरी हो सकती है।
दो सरकारी बैंकों के निजीकरण की भी चर्चा
चार बैंकों में हिस्सेदारी घटाने की योजना के साथ सरकार के पुराने निजीकरण प्रस्ताव पर भी चर्चा हो रही है। केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में IDBI बैंक के अलावा दो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण का प्रस्ताव रखा था।
द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के हवाले से सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक के नाम संभावित निजीकरण उम्मीदवारों के रूप में सामने आए हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इन दोनों बैंकों के निजीकरण को अंतिम मंजूरी मिल चुकी है।
क्या सरकारी बैंकों का विलय भी होगा?
रिपोर्टों में सरकारी बैंकों के एकीकरण या विलय की संभावनाओं पर भी चर्चा की गई है। इस प्रक्रिया में बैंकों की तकनीकी व्यवस्था, भौगोलिक पहुंच और कारोबार के स्वरूप जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा जा सकता है।
हालांकि, हिस्सेदारी बिक्री, निजीकरण और बैंक विलय तीन अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। किसी बैंक में सरकारी हिस्सेदारी घटाने से अपने आप उसका निजीकरण या दूसरे बैंक के साथ विलय नहीं हो जाता।
आम निवेशकों और ग्राहकों पर क्या असर पड़ेगा?
अगर सरकार अपनी हिस्सेदारी बेचती है, तो शेयर बाजार में संबंधित बैंकों के अधिक शेयर उपलब्ध हो सकते हैं। इससे निवेशकों की भागीदारी और शेयरों के कारोबार पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, किसी बैंक की हिस्सेदारी बिक्री की खबर मात्र से उसके शेयर की कीमत बढ़ने या घटने की गारंटी नहीं होती। बैंक की वित्तीय स्थिति, मुनाफा, जोखिम और बाजार की परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण रहेंगी।
बैंक के सामान्य ग्राहकों के लिए भी केवल हिस्सेदारी बिक्री का अर्थ यह नहीं है कि उनके खाते, जमा या बैंकिंग सेवाओं में तुरंत बदलाव होगा। किसी बड़े संरचनात्मक बदलाव की स्थिति में संबंधित बैंक और नियामक की आधिकारिक घोषणाएं महत्वपूर्ण होंगी।
निष्कर्ष
IDBI बैंक की रणनीतिक बिक्री को मंजूरी मिलने के बाद केंद्र सरकार चार अन्य सरकारी बैंकों में हिस्सेदारी 75% तक घटाने पर विचार कर रही है। साथ ही, दो सरकारी बैंकों के निजीकरण की पुरानी योजना भी चर्चा में है। फिलहाल ये प्रस्तावित कदम हैं; संबंधित बैंकों के लिए अंतिम निर्णय, समयसीमा और बिक्री की शर्तों की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है।
अस्वीकरण: यह समाचार 23 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों के आधार पर तैयार किया गया है। प्रस्तावित हिस्सेदारी बिक्री और निजीकरण को अंतिम सरकारी निर्णय न माना जाए। निवेश से संबंधित निर्णय लेने से पहले आधिकारिक घोषणाओं और बैंक के वित्तीय विवरणों की जांच करें।