भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। चुनाव आयोग के भीतर Special Intensive Revision यानी SIR और मतदाता सूची से जुड़े कुछ फैसलों को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की कथित लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने CEC की भूमिका और आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों को अलग तरीके से पेश करते हुए कहा है कि SIR से जुड़े अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।

कौन हैं ज्ञानेश कुमार?

ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के केरल कैडर के IAS अधिकारी रहे हैं। उन्होंने IIT कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग में B.Tech किया। इसके अलावा उन्होंने बिजनेस फाइनेंस और पर्यावरण अर्थशास्त्र की भी पढ़ाई की है।

प्रशासनिक करियर में उन्होंने केरल में सब-कलेक्टर, जिला कलेक्टर, कोच्चि नगर निगम के म्युनिसिपल कमिश्नर और कई अन्य पदों पर काम किया। केंद्र सरकार में उन्होंने रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, संसदीय कार्य मंत्रालय और सहकारिता मंत्रालय में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं।

31 जनवरी 2024 को IAS सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें 15 मार्च 2024 को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया में भी चुनाव आयोग के सदस्य के रूप में काम किया।

इसके बाद 19 फरवरी 2025 को उन्होंने भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का पद संभाला।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

ताजा विवाद की वजह SIR और चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज से जुड़ी एक रिपोर्ट है। The Indian Express की जांच के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों में मतदाता जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने, चुनावी डेटा की सुरक्षा तथा मतदाता डेटाबेस तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल थे।

रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने आरोप लगाया कि महत्वपूर्ण कदम उनकी जानकारी या सहमति के बिना उठाए गए। एक आपत्ति में कथित तौर पर कुछ कार्रवाई को “unauthorised” और “illegal” बताया गया।

क्या चुनाव आयोग में सचमुच मतभेद है?

यहां रिपोर्ट और आयोग के आधिकारिक पक्ष में अंतर है।

The Indian Express की रिपोर्ट आंतरिक लिखित आपत्तियों को आयोग के भीतर गंभीर असहमति के संकेत के रूप में पेश करती है। वहीं चुनाव आयोग ने कहा कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ पहलुओं पर अपनी चिंताएं जरूर व्यक्त की थीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि आयोग के अंतिम फैसलों पर असहमति थी। आयोग के अनुसार SIR से जुड़े निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।

इसके अलावा, रिपोर्टों के मुताबिक तीनों चुनाव आयुक्तों ने इस अवधि में सार्वजनिक ब्रीफिंग में संयुक्त रूप से आयोग का पक्ष रखा था।

विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार को क्यों घेरा?

रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी नेताओं ने CEC ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत विपक्ष के कई नेताओं ने आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर जवाबदेही की मांग की। कुछ विपक्षी नेताओं ने CEC के खिलाफ कार्रवाई और SIR प्रक्रिया पर रोक जैसी मांगें भी उठाईं। ये राजनीतिक दलों के बयान और मांगें हैं, कोई न्यायिक निष्कर्ष नहीं।

विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि CEC के पास अकेले किसी फैसले पर वीटो अधिकार नहीं है। चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है और उसके कामकाज में सामूहिक निर्णय प्रक्रिया लागू होती है।

SIR क्या है?

Special Intensive Revision (SIR) मतदाता सूची की विशेष गहन समीक्षा की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को सत्यापित और अपडेट करना है। इसी प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं के नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने से जुड़े फैसले सार्वजनिक बहस का विषय बने हैं।

ताजा विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयोग भारत में चुनावों और मतदाता सूची की संवैधानिक जिम्मेदारी निभाता है। ऐसे में आयोग के भीतर दर्ज किसी भी औपचारिक आपत्ति का राजनीतिक और संस्थागत महत्व होता है।

फिलहाल स्थिति क्या है?

फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर दो बातें साथ-साथ सामने आती हैं—एक ओर दो चुनाव आयुक्तों की कई लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट है, वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष है कि अंतिम SIR निर्णयों में तीनों आयुक्तों के बीच सहमति थी। इसलिए इसे सीधे तौर पर “CEC के खिलाफ दो चुनाव आयुक्तों का विद्रोह” या किसी फैसले को अवैध घोषित किए जाने के रूप में पेश करना अभी उचित नहीं होगा।

आगे यह विवाद इस बात पर निर्भर करेगा कि आयोग इन लिखित आपत्तियों और उनसे जुड़े रिकॉर्ड पर क्या स्पष्टीकरण देता है और SIR से संबंधित कानूनी चुनौतियों पर अदालतों का क्या रुख रहता है।