IDBI बैंक की बिक्री पर EAS शर्मा ने उठाए सवाल
नई दिल्ली: IDBI बैंक की हिस्सेदारी बेचने के केंद्र सरकार के फैसले पर पूर्व केंद्रीय सचिव ई.ए.एस. शर्मा ने गंभीर आपत्तियां जताई हैं। 15 अक्टूबर 2026 को लिखे पत्र में उन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मांग की कि कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स (CCEA) के फैसले को स्वतंत्र जांच पूरी होने तक रोककर रखा जाए। उन्होंने जांच के निष्कर्ष संसद के सामने पेश करने की भी मांग की है।
₹52,878 करोड़ में बेची जाएगी 60.72% हिस्सेदारी
केंद्र सरकार ने 14 अक्टूबर 2026 को IDBI बैंक की कुल 60.72% हिस्सेदारी बेचने के लिए रणनीतिक खरीदार के चयन को मंजूरी दी थी। इस सौदे में केंद्र सरकार अपनी 30.48% और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) अपनी 30.24% हिस्सेदारी बेचेंगे।
सरकारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, इस सौदे का मूल्य ₹52,878.08 करोड़ तय किया गया है। लेनदेन पूरा होने के बाद केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 15% और LIC की हिस्सेदारी 19% रह जाएगी।
क्या है EAS शर्मा की मुख्य आपत्ति?
शर्मा ने अपने पत्र में सौदे की पारदर्शिता, बैंक की संपत्तियों के मूल्यांकन और संभावित कानूनी समस्याओं पर सवाल उठाए हैं। उनके प्रमुख तर्क इस प्रकार हैं:
1. संपत्तियों के मूल्यांकन पर सवाल
शर्मा का दावा है कि IDBI बैंक की जमीन और अन्य शहरी संपत्तियों का संभावित बाजार मूल्य प्रस्तावित सौदे में पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं होता। उन्होंने विशेष रूप से हैदराबाद में बैंक की जमीन का उदाहरण देते हुए उसके संभावित मूल्य का उल्लेख किया है। यह उनका आकलन है; इसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
2. LIC के पॉलिसीधारकों के हित
शर्मा ने कहा है कि LIC की IDBI बैंक में हिस्सेदारी पॉलिसीधारकों के धन से जुड़ी है। इसलिए हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया में पॉलिसीधारकों के हितों और जवाबदेही पर पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए।
3. खरीदार के अन्य वित्तीय हित
शर्मा ने Fairfax समूह के अन्य बैंकिंग और वित्तीय सेवा कारोबारों का उल्लेख करते हुए संभावित हितों के टकराव पर चिंता जताई है। उन्होंने इस पहलू की स्वतंत्र जांच की मांग की है। हालांकि, संभावित हितों का टकराव अपने आप में किसी कानूनी उल्लंघन का प्रमाण नहीं है।
4. संसद को जानकारी देने की मांग
शर्मा चाहते हैं कि स्वतंत्र जांच में सामने आने वाले निष्कर्ष संसद के समक्ष रखे जाएं, ताकि सौदे के मूल्यांकन और सार्वजनिक हित से जुड़े सवालों पर जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
सरकार ने मूल्यांकन पर क्या कहा?
वित्त मंत्रालय ने अपने आधिकारिक स्पष्टीकरण में कहा कि IDBI बैंक का मूल्यांकन दो स्वतंत्र पेशेवर एजेंसियों द्वारा किया गया था। इसके लिए बाजार में समान बैंकों के मूल्यांकन और बैंक की संपत्तियों के मूल्यांकन की पद्धतियों का इस्तेमाल किया गया।
सरकार के अनुसार, इन दोनों मूल्यांकनों से निकला औसत बेंचमार्क मूल्य ₹75.99 प्रति शेयर था, जबकि सफल बोली ₹81 प्रति शेयर रही। मंत्रालय का कहना है कि सफल बोली बेंचमार्क और दोनों एजेंसियों के उचित मूल्य अनुमानों से अधिक थी।
इस तरह, जहां शर्मा ने सौदे के मूल्यांकन और सार्वजनिक हित पर सवाल उठाए हैं, वहीं सरकार ने अपनी प्रक्रिया का बचाव स्वतंत्र मूल्यांकन और प्रतिस्पर्धी बोली के आधार पर किया है।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल शर्मा ने सरकार से फैसले को स्थगित रखने और स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। यह मांग अपने आप में सौदे पर रोक लगने के बराबर नहीं है। सरकार द्वारा इस मांग पर कोई नया आधिकारिक निर्णय लिए जाने की पुष्टि आवश्यक होगी।
सौदे को पूरा करने से पहले सफल खरीदार को भारतीय रिजर्व बैंक की नियामकीय प्रक्रिया और निर्धारित पात्रता संबंधी शर्तें पूरी करनी होंगी।
निष्कर्ष
IDBI बैंक की हिस्सेदारी बिक्री पर EAS शर्मा की आपत्तियों ने मूल्यांकन, पारदर्शिता और LIC के पॉलिसीधारकों के हितों से जुड़े सवाल फिर सामने ला दिए हैं। दूसरी ओर, सरकार ने सौदे का बचाव स्वतंत्र मूल्यांकन और सफल बोली के आधार पर किया है। अब इस विवाद में सरकार की प्रतिक्रिया और नियामकीय प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
अस्वीकरण: यह समाचार उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों, EAS शर्मा के पत्र और वित्त मंत्रालय की आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। शर्मा द्वारा लगाए गए आरोप और मूल्यांकन संबंधी दावे उनके विचार हैं; उन्हें स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।