चीन के 'वॉटर बम' के जवाब में भारत बना रहा सुरक्षा कवच, फिर आदि समुदाय क्यों कर रहा विरोध?
ईटानगर/नई दिल्ली: भारत और चीन के बीच हिमालयी नदियों के पानी को लेकर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज होती दिखाई दे रही है। चीन के तिब्बत क्षेत्र में यारलुंग त्सांगपो नदी पर विशाल जलविद्युत परियोजना विकसित करने की योजना के बीच भारत अरुणाचल प्रदेश में सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना (Siang Upper Multipurpose Project—SUMP) को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहा है।
प्रस्तावित परियोजना की क्षमता लगभग 11,200 मेगावाट बताई गई है। इसे केवल बिजली उत्पादन की परियोजना नहीं, बल्कि पानी के भंडारण, बाढ़ प्रबंधन और राष्ट्रीय जल सुरक्षा से जुड़ी योजना के रूप में भी देखा जा रहा है।
हालांकि, अरुणाचल प्रदेश की सियांग घाटी में रहने वाला आदि जनजातीय समुदाय इस परियोजना का विरोध कर रहा है। स्थानीय लोगों को आशंका है कि विशाल जलाशय बनने से उनकी उपजाऊ जमीन, गांव, खेती और पारंपरिक जीवनशैली पर गंभीर असर पड़ सकता है। समुदाय का कहना है कि उनकी जमीन और नदी से जुड़े फैसले लेने से पहले उन्हें पूरी जानकारी दी जाए और उनकी सहमति को महत्व दिया जाए।
1. चीन का 'वॉटर बम' क्या है और भारत क्यों चिंतित है?
चीन के तिब्बत क्षेत्र में यारलुंग त्सांगपो नदी पर विशाल जलविद्युत परियोजना विकसित की जा रही है। यह नदी आगे भारत में प्रवेश करने के बाद सियांग कहलाती है और असम पहुंचकर ब्रह्मपुत्र नदी का हिस्सा बनती है।
चीन ने दिसंबर 2024 में यारलुंग त्सांगपो के निचले हिस्से में एक बड़ी जलविद्युत परियोजना को मंजूरी दी थी। इसकी घोषित क्षमता लगभग 60,000 मेगावाट बताई गई है। परियोजना के पैमाने और नदी के संवेदनशील भौगोलिक क्षेत्र में स्थित होने के कारण भारत में इसके संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई गई है।
भारत की चिंता मुख्य रूप से तीन पहलुओं से जुड़ी है:
- पानी के बहाव पर असर: चीन में बांधों के संचालन से नदी के पानी के मौसमी प्रवाह में बदलाव आने की आशंका है।
- अचानक पानी छोड़े जाने का खतरा: अत्यधिक पानी छोड़े जाने की स्थिति में निचले इलाकों में बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है, हालांकि इसका वास्तविक खतरा बांध के संचालन, मौसम और जलप्रवाह पर निर्भर करेगा।
- सूखे के दौरान पानी की उपलब्धता: यदि ऊपरी हिस्से में पानी का प्रवाह प्रभावित होता है, तो भारत में नदी पर निर्भर आबादी और कृषि पर असर पड़ने की आशंका है।
इन्हीं चिंताओं के बीच भारत की प्रस्तावित सियांग परियोजना को रणनीतिक महत्व दिया जा रहा है। हालांकि, चीन के बांध को सीधे 'वॉटर बम' कहना एक रणनीतिक और राजनीतिक उपमा है। इससे यह अपने आप साबित नहीं होता कि चीन नदी के पानी को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है।
2. भारत की सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना क्या है?
सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी पर प्रस्तावित एक विशाल जल भंडारण और जलविद्युत परियोजना है। इसकी क्षमता लगभग 11,200 मेगावाट बताई गई है।
इस परियोजना का उद्देश्य केवल बिजली पैदा करना नहीं है। प्रस्ताव के समर्थकों के अनुसार, बड़े जलाशय की मदद से पानी का भंडारण किया जा सकता है और परिस्थितियों के अनुसार नदी के प्रवाह को प्रबंधित करने में सहायता मिल सकती है।
परियोजना के प्रमुख संभावित उद्देश्य हैं:
- जलविद्युत उत्पादन के माध्यम से बिजली उपलब्ध कराना।
- नदी के पानी का भंडारण करना।
- बाढ़ के जोखिम को कम करने में सहायता करना।
- चीन की ऊपरी नदी परियोजनाओं से जुड़े संभावित जल सुरक्षा जोखिमों के लिए रणनीतिक तैयारी करना।
- अरुणाचल प्रदेश में बुनियादी ढांचे और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना।
हालांकि, इन लाभों का वास्तविक स्वरूप परियोजना की अंतिम डिजाइन, जलाशय की क्षमता, संचालन के नियमों और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन पर निर्भर करेगा। परियोजना की तैयारी के मौजूदा चरण में इन सभी संभावित लाभों को सुनिश्चित परिणाम मानना उचित नहीं होगा।
3. फिर आदि जनजातीय समुदाय इस परियोजना का विरोध क्यों कर रहा है?
आदि समुदाय का विरोध केवल एक बांध के निर्माण तक सीमित नहीं है। यह उनकी जमीन, आजीविका, सांस्कृतिक पहचान और अपने क्षेत्र से जुड़े फैसलों में भागीदारी के अधिकार से भी संबंधित है।
सियांग घाटी के कई स्थानीय परिवार पीढ़ियों से नदी के आसपास की जमीन पर खेती करते आए हैं। धान के खेत, फलदार बगीचे, अदरक और इलायची जैसी फसलें तथा अन्य स्थानीय कृषि गतिविधियां उनकी आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
समुदाय को आशंका है कि विशाल जलाशय के निर्माण से कई गांव डूब सकते हैं और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले हजारों परिवारों को विस्थापन का सामना करना पड़ सकता है।
स्थानीय संगठनों ने परियोजना से प्रभावित होने वाले गांवों की संख्या और संभावित विस्थापन को लेकर गंभीर चिंताएं जताई हैं। कुछ अनुमानों में 27 गांवों के डूबने और लगभग 1 से 1.5 लाख लोगों के प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की गई है। ये स्थानीय पक्षों द्वारा उठाए गए अनुमान हैं; अंतिम प्रभावित आबादी और गांवों की संख्या की पुष्टि विस्तृत परियोजना रिपोर्ट और आधिकारिक पुनर्वास योजना से होनी बाकी है।
4. आदि समुदाय के लिए सियांग नदी सिर्फ पानी नहीं, आस्था का प्रतीक है
आदि समुदाय सियांग नदी को 'आने सियांग' यानी मां सियांग के रूप में सम्मान देता है। नदी उनकी धार्मिक मान्यताओं, पारंपरिक संस्कृति, सामाजिक जीवन और स्थानीय पहचान से गहराई से जुड़ी हुई है।
स्थानीय लोगों के लिए जमीन केवल आर्थिक संपत्ति नहीं है। वह उनके पूर्वजों, पारंपरिक ज्ञान और पीढ़ियों से चले आ रहे जीवन का हिस्सा है। नदी के आसपास के जंगल, खेत और गांव उनकी सांस्कृतिक व्यवस्था को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसलिए समुदाय की चिंता केवल मुआवजे तक सीमित नहीं है। यदि किसी परिवार को दूसरी जगह बसाया भी जाए, तो उसकी पारंपरिक जमीन, सामाजिक संबंधों, सांस्कृतिक स्थलों और आजीविका की पूरी भरपाई करना कठिन हो सकता है।
आदि समुदाय के विरोध का एक महत्वपूर्ण पहलू यही है कि विकास परियोजना का मूल्यांकन केवल बिजली उत्पादन और राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की सामाजिक और सांस्कृतिक जरूरतों के आधार पर भी किया जाए।
5. समुदाय की प्रमुख मांगें क्या हैं?
सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम (SIFF), ऑल आदि यूथ एसोसिएशन (AAYA) और अन्य स्थानीय समूहों ने परियोजना को लेकर अलग-अलग अवसरों पर अपनी आपत्तियां और मांगें सामने रखी हैं।
प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:
- परियोजना पर पुनर्विचार: स्थानीय विरोध करने वाले समूह प्रस्तावित विशाल बांध और उससे जुड़े सर्वेक्षण को रोकने या परियोजना को रद्द करने की मांग कर रहे हैं।
- स्थानीय समुदाय से वास्तविक परामर्श: गांवों के स्तर पर पूरी जानकारी उपलब्ध कराई जाए और प्रभावित लोगों की राय को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाए।
- सहमति की प्रक्रिया में पारदर्शिता: स्थानीय संगठनों ने कुछ समझौतों और सहमति प्राप्त करने के तरीकों पर सवाल उठाए हैं। उनकी मांग है कि किसी भी गांव की ओर से सहमति को पूरे समुदाय की सहमति मानने से पहले उचित प्रक्रिया अपनाई जाए।
- सुरक्षा बलों की वापसी: विरोध करने वाले संगठनों ने परियोजना से संबंधित सर्वेक्षण क्षेत्रों में तैनात केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) को वापस बुलाने की मांग की है।
- प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई पर पुनर्विचार: कुछ स्थानीय संगठनों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR वापस लेने और संबंधित प्रशासनिक कार्रवाई पर पुनर्विचार की मांग की है।
- पर्यावरणीय और भूकंपीय जोखिमों का आकलन: समुदाय चाहता है कि क्षेत्र की जैव विविधता, भूकंप के खतरे, नदी के पारिस्थितिकी तंत्र और संभावित विस्थापन का व्यापक अध्ययन किया जाए।
इन मांगों के पीछे मुख्य सवाल यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास के लाभों के साथ स्थानीय आबादी के अधिकारों और जोखिमों का संतुलन कैसे बनाया जाएगा।
6. परियोजना के सर्वेक्षण के दौरान तनाव क्यों बढ़ा?
सियांग घाटी में परियोजना के प्रारंभिक सर्वेक्षण और ड्रिलिंग की तैयारियों के दौरान स्थानीय विरोध तेज हुआ है। प्रस्तावित निर्माण स्थल के आसपास सुरक्षा बलों की तैनाती ने समुदाय के एक हिस्से की चिंताओं को और बढ़ा दिया।
स्थानीय संगठनों का आरोप है कि परियोजना के लिए जमीन और गांवों से जुड़े फैसले पर्याप्त सामुदायिक चर्चा के बिना आगे बढ़ाए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि कुछ गांवों या प्रतिनिधियों के साथ हुए समझौतों को व्यापक जनसमर्थन के रूप में कैसे देखा जा सकता है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार और परियोजना के समर्थकों का तर्क है कि चीन की ऊपरी नदी परियोजनाओं को देखते हुए भारत को अपनी जल सुरक्षा और रणनीतिक हितों की तैयारी करनी चाहिए।
अक्टूबर 2026 में विरोध प्रदर्शनों, सुरक्षा व्यवस्था और कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की खबरों के बीच तनाव और बढ़ा। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी आदि समुदाय के वरिष्ठ सदस्यों के साथ संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया है।
इस घटनाक्रम से स्पष्ट है कि परियोजना को लेकर विवाद केवल तकनीकी या पर्यावरणीय नहीं है। यह प्रशासन, स्थानीय स्वशासन, पारंपरिक अधिकारों और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन का सवाल भी बन गया है।
7. क्या इस बांध से चीन के पानी को रोका जा सकेगा?
यह इस पूरी परियोजना से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी प्रश्न है। प्रस्तावित बांध के समर्थकों का तर्क है कि बड़ा जलाशय नदी में पानी का भंडारण करके अचानक आने वाले अधिक प्रवाह को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।
लेकिन किसी भी बांध की वास्तविक क्षमता उसकी डिजाइन, उपलब्ध खाली जलाशय क्षमता, जलग्रहण क्षेत्र में बारिश, बाढ़ की तीव्रता और संचालन के नियमों पर निर्भर करती है।
यदि चीन के ऊपरी हिस्से में बांध से अचानक पानी छोड़ा जाता है, तो भारत में प्रस्तावित जलाशय कितना पानी रोक पाएगा, यह विस्तृत जलवैज्ञानिक मॉडलिंग और आपदा जोखिम आकलन के बिना निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।
इसी तरह, यदि ऊपरी हिस्से से पानी का प्रवाह लंबे समय तक कम होता है, तो भारत का जलाशय सीमित उपलब्ध पानी को ही संग्रहित कर सकेगा। वह नदी में पानी पैदा नहीं कर सकता।
इसलिए सियांग परियोजना को चीन की गतिविधियों से जुड़े सभी संभावित जोखिमों का पूर्ण समाधान मानने के बजाय जल सुरक्षा की व्यापक रणनीति के एक संभावित हिस्से के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
8. पर्यावरण और भूकंप का खतरा कितना गंभीर है?
सियांग घाटी हिमालयी क्षेत्र में स्थित है, जहां भूकंपीय गतिविधियों का जोखिम महत्वपूर्ण है। इतने बड़े जलाशय और बांध के निर्माण के लिए भूगर्भीय स्थिरता, भूकंप की संभावना, भूस्खलन और नदी के प्राकृतिक प्रवाह का विस्तृत अध्ययन जरूरी होगा।
इसके अतिरिक्त, बड़े जलाशय से जंगलों, वन्यजीवों, स्थानीय कृषि भूमि और नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है। बांध के कारण नदी में तलछट के प्रवाह, मछलियों के आवागमन और नीचे की ओर रहने वाले समुदायों की जल उपलब्धता में भी बदलाव हो सकता है।
परियोजना के अंतिम पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का आकलन आधिकारिक अध्ययन और स्वतंत्र विशेषज्ञ समीक्षा के आधार पर होना चाहिए। केवल परियोजना के रणनीतिक महत्व या केवल स्थानीय आशंकाओं के आधार पर सभी तकनीकी परिणामों को पहले से तय मानना उचित नहीं होगा।
9. सरकार और स्थानीय समुदाय के बीच आगे का रास्ता क्या है?
इस विवाद को सुलझाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण जरूरत भरोसे और पारदर्शी संवाद की है। स्थानीय संगठनों ने बातचीत, पारंपरिक सामुदायिक संस्थाओं की भागीदारी और सुरक्षा बलों की तैनाती पर पुनर्विचार की मांग की है।
यदि परियोजना को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया जाता है, तो प्रभावित गांवों की पहचान, जमीन के स्वामित्व, पुनर्वास, आजीविका के विकल्प, पर्यावरणीय नुकसान और मुआवजे की प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए।
इसके साथ ही, समुदाय को परियोजना की तकनीकी जानकारी स्थानीय भाषा में उपलब्ध कराना और गांव-स्तरीय परामर्श को वास्तविक निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनाना महत्वपूर्ण होगा। यदि किसी लागू कानून के तहत ग्राम सभा की सहमति या अन्य औपचारिक प्रक्रिया आवश्यक है, तो उसका पालन किया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय अधिकारों को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करने के बजाय ऐसी प्रक्रिया विकसित करना आवश्यक है, जिसमें रणनीतिक जरूरतों के साथ प्रभावित लोगों की चिंताओं पर भी गंभीरता से विचार हो।
निष्कर्ष
चीन की विशाल जलविद्युत परियोजना और ब्रह्मपुत्र के ऊपरी प्रवाह को लेकर चिंताओं के बीच भारत की सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना को रणनीतिक महत्व दिया जा रहा है। लेकिन अरुणाचल प्रदेश का आदि समुदाय इसे अपनी जमीन, नदी, खेती और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा मुद्दा मानता है।
समुदाय की प्रमुख मांगें हैं कि परियोजना पर पुनर्विचार किया जाए, स्थानीय लोगों से पारदर्शी तरीके से परामर्श हो, उनकी सहमति और पारंपरिक अधिकारों का सम्मान किया जाए तथा सुरक्षा बलों की तैनाती और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई पर पुनर्विचार किया जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार जल सुरक्षा की अपनी रणनीति को आगे बढ़ाते हुए स्थानीय समुदाय के भरोसे और अधिकारों की रक्षा के लिए पर्याप्त कदम उठा पाएगी।