ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जारी संघर्ष को लेकर तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई के सलाहकार याह्या रहीम सफवी ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका या इजरायल ने दोबारा हमला किया तो युद्ध का मोर्चा हिंद महासागर और उससे आगे तक फैल सकता है। यह बयान ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी Fars के जरिए सामने आया है।

ईरान ने क्या चेतावनी दी?

सफवी ने कहा कि संघर्ष पहले ही फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होते हुए लाल सागर तक फैल चुका है। उनके मुताबिक, अगर युद्ध आगे बढ़ता है तो इसका भौगोलिक दायरा हिंद महासागर तक पहुंच सकता है।

हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि हिंद महासागर में किस इलाके, सैन्य ठिकाने या व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाया जा सकता है। इसलिए इसे फिलहाल युद्ध के संभावित विस्तार की चेतावनी के तौर पर देखना जरूरी है, न कि भारतीय समुद्री क्षेत्र पर किसी घोषित हमले की योजना के रूप में।

भारत के लिए क्यों बढ़ सकती है चिंता?

हिंद महासागर भारत के लिए ऊर्जा और व्यापार का महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। पश्चिम एशिया से आने वाला तेल और गैस समुद्री रास्तों से एशिया के बाजारों तक पहुंचता है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण chokepoint है। IEA के अनुसार, 2025 में लगभग 15 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल होर्मुज से होकर गुजरा, जो वैश्विक समुद्री कच्चे तेल व्यापार का करीब 34% था। इनमें से अधिकांश तेल एशिया पहुंचता है और चीन तथा भारत मिलकर होर्मुज से गुजरने वाले तेल निर्यात का करीब 44% प्राप्त करते हैं।

अगर संघर्ष के कारण समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ता है तो तेल टैंकरों के लिए बीमा, सुरक्षा और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है। जहाजों को लंबे वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ सकते हैं, जिससे यात्रा का समय और खर्च दोनों बढ़ेंगे।

चीन पर भी असर क्यों?

चीन दुनिया का बड़ा कच्चा तेल आयातक है और पश्चिम एशिया से उसकी ऊर्जा आपूर्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा आता है। हालांकि चीन के पास रूस और मध्य एशिया से पाइपलाइन के जरिए तेल लेने जैसे वैकल्पिक विकल्प हैं, लेकिन ये समुद्री आयात का पूरा विकल्प नहीं हैं।

इसलिए अगर होर्मुज और लाल सागर के बाद तनाव हिंद महासागर तक फैलता है, तो भारत और चीन दोनों के लिए समुद्री ऊर्जा आपूर्ति और शिपिंग लागत से जुड़े जोखिम बढ़ सकते हैं।

तेल टैंकरों के फंसने का खतरा कितना?

मौजूदा संघर्ष में पहले ही होर्मुज और आसपास के समुद्री मार्गों पर जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। Reuters के अनुसार, हाल के दिनों में होर्मुज से गुजरने वाले कमोडिटी जहाजों की संख्या युद्ध से पहले के औसत की तुलना में काफी कम हुई है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत आने वाले सभी तेल जहाज रुक जाएंगे। वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि संघर्ष किस क्षेत्र तक फैलता है, समुद्री सुरक्षा की स्थिति कैसी रहती है और जहाजरानी कंपनियां कौन से वैकल्पिक मार्ग अपनाती हैं।

लाल सागर और बाब-अल-मंदेब भी अहम

हिंद महासागर तक पहुंचने वाले समुद्री व्यापार में बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य भी महत्वपूर्ण है। यह लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ता है।

लाल सागर में पहले से जारी सुरक्षा संकट के कारण कई जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे यानी केप ऑफ गुड होप के रास्ते भेजा जा रहा है। इससे यात्रा लंबी होती है और ईंधन, माल ढुलाई तथा बीमा लागत बढ़ सकती है।

भारत के लिए अभी सबसे बड़ा सवाल

ईरान की ताजा चेतावनी से यह संकेत जरूर मिलता है कि संघर्ष का संभावित भौगोलिक दायरा बढ़ने का जोखिम मौजूद है, लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि युद्ध निश्चित रूप से हिंद महासागर तक फैल जाएगा।

भारत के लिए तत्काल निगरानी के प्रमुख क्षेत्र होंगे:

  1. 🛢️ कच्चे तेल की कीमत और उपलब्धता
  2. 🚢 होर्मुज और बाब-अल-मंदेब से जहाजों की आवाजाही
  3. 💰 समुद्री बीमा और freight costs
  4. 🇮🇳 भारत आने वाले तेल टैंकरों की सुरक्षा
  5. 🌏 चीन और अन्य एशियाई देशों की ऊर्जा मांग
  6. ⚓ हिंद महासागर में भारतीय नौसेना की निगरानी

फिलहाल ईरानी बयान एक चेतावनी है, घोषित भारतीय समुद्री हमले की योजना नहीं। लेकिन अगर संघर्ष वास्तव में फारस की खाड़ी और लाल सागर से आगे हिंद महासागर तक फैलता है, तो इसका असर केवल युद्धरत देशों तक सीमित न रहकर भारत-चीन सहित पूरे एशियाई ऊर्जा और समुद्री व्यापार तंत्र पर पड़ सकता है।