ट्रंप की हार से इसराइल में चिंता, रिश्तों पर पड़ सकता है असर
यरुशलम: अमेरिका के 2026 मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की हार का असर केवल अमेरिकी राजनीति तक सीमित नहीं है। इसराइल में भी इन नतीजों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लिया है। इससे इसराइल को मिलने वाली अमेरिकी सैन्य सहायता और दोनों देशों के रणनीतिक रिश्तों पर नए सवाल खड़े हुए हैं।
इसराइली मीडिया का मानना है कि ट्रंप की पार्टी की हार से प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक रणनीति पर भी असर पड़ सकता है। नेतन्याहू ने पिछले कुछ वर्षों में ट्रंप के साथ अपने करीबी संबंधों को इसराइल के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक ताकत के रूप में पेश किया है।
इसराइली अखबारों ने नतीजों को कैसे देखा?
अमेरिकी चुनाव परिणामों के बाद इसराइल के प्रमुख समाचार पत्रों ने इसे ट्रंप और इसराइल दोनों के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम बताया।
- Maariv: अखबार ने लिखा कि ट्रंप अकेले चुनाव के नुकसान का सामना नहीं कर रहे हैं, बल्कि इन नतीजों से इसराइल में भी गहरी चिंता पैदा हुई है।
- Yedioth Ahronoth: अखबार ने डेमोक्रेट्स की जीत को ट्रंप की बड़ी चुनावी हार और कांग्रेस में सत्ता के ऐतिहासिक बदलाव के रूप में पेश किया।
- Israel Hayom: इस अखबार ने चेतावनी दी कि नई अमेरिकी कांग्रेस इसराइल के प्रति पहले से अधिक आलोचनात्मक रुख अपना सकती है।
- Channel 14: नेतन्याहू के समर्थक माने जाने वाले इस चैनल ने भी परिणामों को ट्रंप और इसराइल के लिए बड़ा झटका बताया।
इन प्रतिक्रियाओं से पता चलता है कि इसराइल में चुनाव के नतीजों को अमेरिका-इसराइल संबंधों के भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है।
नेतन्याहू की ट्रंप पर निर्भरता पर उठे सवाल
अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, इसराइल में विपक्षी नेताओं ने कहा है कि नेतन्याहू ने अमेरिका के साथ संबंधों को मुख्य रूप से रिपब्लिकन पार्टी और ट्रंप के इर्द-गिर्द केंद्रित कर दिया।
पूर्व प्रधानमंत्री यायर लैपिड ने अमेरिकी चुनाव परिणामों के बाद नेतन्याहू की आलोचना की। उन्होंने कहा कि इसराइल को अमेरिका में किसी एक राजनीतिक दल पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उनके अनुसार, इसराइल को रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स दोनों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखने चाहिए।
विपक्षी नेता यायर गोलान ने भी कहा कि अमेरिकी चुनाव के नतीजे दिखाते हैं कि नेतन्याहू की छवि अमेरिका में दोनों दलों के बीच विवाद का विषय बन गई है।
हालांकि, ये विपक्षी नेताओं के राजनीतिक आकलन हैं। अमेरिकी चुनाव परिणाम अपने आप में इसराइल के प्रति अमेरिकी नीति में तत्काल बदलाव की पुष्टि नहीं करते।
अमेरिकी कांग्रेस में इसराइल के आलोचकों की संख्या बढ़ी
इस चुनाव में कुछ ऐसे डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों ने भी जीत हासिल की है, जिन्होंने इसराइल को दी जाने वाली अमेरिकी सैन्य सहायता पर सवाल उठाए थे।
मिशिगन से जीतने वाले डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अब्दुल एल-सayed ने अपने चुनाव अभियान में इसराइल को अमेरिकी आर्थिक और सैन्य सहायता देने का विरोध किया था। इसराइली मीडिया ने उनकी जीत को अमेरिका में इसराइल की नीतियों के विरोध के बढ़ते प्रभाव से जोड़कर देखा।
हालांकि, डेमोक्रेटिक पार्टी के सभी सांसद इसराइल के विरोधी नहीं हैं। पार्टी में ऐसे कई नेता भी हैं जो इसराइल के साथ अमेरिकी रणनीतिक साझेदारी और सुरक्षा सहयोग का समर्थन करते हैं।
सैन्य सहायता पर बढ़ सकता है दबाव
अमेरिका लंबे समय से इसराइल का सबसे महत्वपूर्ण सैन्य और कूटनीतिक सहयोगी रहा है। दोनों देशों के बीच मौजूदा समझौते के तहत अमेरिका इसराइल को हर साल लगभग 3.8 अरब डॉलर की सैन्य सहायता देता है।
रॉयटर्स की 3 नवंबर की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने चुनाव के दिन कहा था कि उन्होंने नेतन्याहू के साथ समझौता किया है कि इस साल के अंत तक इसराइल को दी जाने वाली लगभग 4 अरब डॉलर की वार्षिक सहायता बंद कर दी जाएगी। हालांकि, उन्होंने इस फैसले को लागू करने का विस्तृत तरीका स्पष्ट नहीं किया था। मौजूदा सहायता समझौता सितंबर 2028 तक लागू है।
नई कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने से हथियारों की बिक्री, सैन्य सहायता और इसराइल की नीतियों पर संसदीय निगरानी बढ़ सकती है।
ईरान युद्ध भी बना अमेरिका-इसराइल संबंधों का बड़ा मुद्दा
अमेरिका और इसराइल के संयुक्त सैन्य अभियान के बाद ईरान के साथ संघर्ष लंबा खिंच गया है। इसका असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था, ऊर्जा कीमतों और चुनावी राजनीति पर भी पड़ा।
अल जजीरा की रिपोर्ट में मैरीलैंड विश्वविद्यालय के राजनीतिक विश्लेषक शिबली तेलहामी के हवाले से कहा गया कि अमेरिकी चुनाव में विदेश नीति, खासकर ईरान युद्ध और इसराइल को अमेरिकी समर्थन, महत्वपूर्ण मुद्दे रहे।
अमेरिका के कई मतदाताओं ने युद्ध के आर्थिक प्रभाव और ऊर्जा की बढ़ती कीमतों को लेकर चिंता जताई। इसराइल में भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या ट्रंप प्रशासन के लिए भविष्य में इसराइल को बिना राजनीतिक दबाव के समर्थन देना आसान रहेगा।
नेतन्याहू के लिए दोहरी राजनीतिक चुनौती
अमेरिका के चुनाव परिणाम ऐसे समय आए हैं, जब इसराइल में भी 27 अक्टूबर को हुए चुनाव के बाद राजनीतिक अनिश्चितता बनी हुई है। नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी गठबंधन को संसद में बहुमत नहीं मिला और उसे सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत है।
ऐसे में नेतन्याहू को घरेलू राजनीति के साथ-साथ अमेरिका में बदलते राजनीतिक समीकरणों का भी सामना करना पड़ सकता है।
क्या अमेरिका-इसराइल संबंध कमजोर होंगे?
डेमोक्रेट्स के कांग्रेस के दोनों सदनों में बहुमत हासिल करने से अमेरिकी प्रशासन की नीतियों पर निगरानी और बहस बढ़ सकती है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि अमेरिका इसराइल का समर्थन पूरी तरह बंद कर देगा।
अमेरिका में इसराइल के समर्थक दोनों राजनीतिक दलों में मौजूद हैं। इसलिए आने वाले समय में सैन्य सहायता, हथियारों की बिक्री, गाजा और ईरान जैसे मुद्दों पर कांग्रेस के भीतर बहस महत्वपूर्ण होगी।
निष्कर्ष: अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में ट्रंप की पार्टी की हार को इसराइल में एक बड़े कूटनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इसराइली मीडिया और विपक्षी नेताओं की चिंता का केंद्र यह है कि नेतन्याहू की ट्रंप पर निर्भरता अब इसराइल के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकती है। हालांकि, अमेरिका-इसराइल संबंधों में वास्तविक बदलाव आने वाले महीनों में लिए जाने वाले फैसलों से ही स्पष्ट होगा।