सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां की मताधिकार को लेकर की गई टिप्पणी इन दिनों चर्चा में है। हैदराबाद स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारतीय नागरिक के लिए नागरिकता और वोट देने का अधिकार एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।
उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश में मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस चल रही है। हालांकि, अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने किसी विशेष चुनावी प्रक्रिया या संस्था का नाम लेकर टिप्पणी नहीं की।
कौन हैं जस्टिस उज्जल भुइयां?
जस्टिस उज्जल भुइयां सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश हैं। उन्होंने अपने न्यायिक करियर में संवैधानिक और सार्वजनिक महत्व के कई मामलों पर सुनवाई की है। इससे पहले वे विभिन्न उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश के रूप में कार्य कर चुके हैं।
4 अक्टूबर 2026 को NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद में आयोजित 19वें NALSAR-Justice B.R. Sawhney Memorial Moot Court Competition के समापन समारोह में उन्होंने मुख्य संबोधन दिया।
वोट के अधिकार को लेकर क्या कहा?
जस्टिस भुइयां ने कहा कि अगर किसी प्रक्रिया के कारण लाखों भारतीय नागरिक अपने वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाते हैं और अपने ही देश में 'दूसरे दर्जे के नागरिक' की स्थिति में पहुंच जाते हैं, तो ऐसी प्रक्रिया अपने आप में मनमानी होगी।
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14 और 326 का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों के दो वर्गों की कल्पना नहीं करता—एक वर्ग जिसके पास मतदान का अधिकार हो और दूसरा जिसके पास यह अधिकार न हो।
वोटिंग का अधिकार और नागरिकता
जस्टिस भुइयां ने कहा कि किसी भारतीय नागरिक के व्यक्तित्व से उसके वोट देने के अधिकार या मतदाता सूची में शामिल होने के अधिकार को अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसकी तुलना शरीर से आत्मा निकालने से की।
उनके अनुसार, मतदान का अधिकार केवल चुनाव के दिन वोट डालने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिक की लोकतांत्रिक भागीदारी का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि एक आम नागरिक के लिए शासन में भागीदारी का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता उसका मताधिकार है।
अनुच्छेद 326 का किया जिक्र
जस्टिस भुइयां ने संविधान के अनुच्छेद 326 का विशेष रूप से उल्लेख किया। यह प्रावधान लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को वयस्क मताधिकार के आधार पर कराने से संबंधित है।
उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 326 के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। उनके अनुसार, कोई भी प्राधिकरण संविधान से ऊपर नहीं है और किसी प्रक्रिया के जरिए बड़े पैमाने पर नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
मतदाता सूची से नाम हटाने पर भी टिप्पणी
जस्टिस भुइयां ने मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पर भी महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि किसी मृत मतदाता के मामले को छोड़कर, एक बार मतदाता सूची में नाम दर्ज होने के बाद उसे बिना नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए हटाया नहीं जाना चाहिए।
उन्होंने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के Lal Babu Hussain बनाम Electoral Registration Officer मामले का उल्लेख किया।
SIR विवाद के बीच टिप्पणी क्यों महत्वपूर्ण?
जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर बहस जारी है। इस प्रक्रिया को लेकर विपक्ष और अन्य पक्षों की ओर से आशंका जताई गई है कि पात्र मतदाताओं के नाम सूची से बाहर हो सकते हैं, जबकि चुनाव आयोग की प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को संशोधित और सत्यापित करना है।
जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में किसी विशेष SIR प्रक्रिया पर फैसला नहीं सुनाया, लेकिन उन्होंने व्यापक संवैधानिक सिद्धांत पर जोर दिया कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया जो बड़ी संख्या में नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित करे, संवैधानिक कसौटी पर परखी जानी चाहिए।
'कोई संविधान से ऊपर नहीं'
अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने स्पष्ट किया कि संविधान सर्वोच्च है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी विशेषताओं में शामिल हैं और नागरिकों के मताधिकार को कमजोर करने वाली किसी भी प्रक्रिया को संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत में एक अरबपति और एक रिक्शा चालक के वोट का मूल्य समान है। यही राजनीतिक समानता लोकतंत्र की बुनियाद है।