संसद के मॉनसून सत्र के अंतिम दिन खान एवं खनिज क्षेत्र से जुड़ा महत्वपूर्ण खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 राज्यसभा में चर्चा और पारित करने के लिए लिया गया। इससे पहले लोकसभा इस विधेयक को 12 अगस्त को विपक्ष के हंगामे के बीच बिना चर्चा के पारित कर चुकी थी।
विधेयक में खनन और खनिज क्षेत्र को अधिक कुशल, निवेश-अनुकूल और प्रतिस्पर्धी बनाने पर जोर दिया गया है। इसका एक प्रमुख उद्देश्य देश में महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों की खोज और उत्पादन को बढ़ावा देना है, जो ऊर्जा सुरक्षा और आधुनिक उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
प्रस्तावित बदलावों के तहत खनन पट्टाधारक अपने मौजूदा लीज में कुछ अन्य खनिजों को शामिल करने के लिए राज्य सरकार से आवेदन कर सकेंगे। महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों जैसे लिथियम, ग्रेफाइट, निकेल और कोबाल्ट को शामिल करने के लिए अलग भुगतान से जुड़ी विशेष व्यवस्था प्रस्तावित है।
विधेयक में कैप्टिव खदानों से उत्पादित खनिजों की बिक्री पर मौजूदा 50 प्रतिशत सीमा हटाने का भी प्रस्ताव है। इसके अलावा, राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट के दायरे को बढ़ाकर उसे खदानों और खनिजों के विकास के लिए भी वित्त उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव रखा गया है।
एक बड़ा बदलाव राज्यों की खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर अतिरिक्त टैक्स, सेस या लेवी लगाने से जुड़ा है। विधेयक में ऐसी लेवी पर केंद्र द्वारा तय शर्तों और सीमाओं के अधीन रोक लगाने का प्रावधान है। इस प्रावधान को लेकर खनिज संपदा वाले राज्यों में राजस्व और संघीय अधिकारों को लेकर बहस भी तेज हो सकती है।
सरकार का तर्क है कि अलग-अलग राज्यों में अलग कर और शुल्क व्यवस्था से खनन क्षेत्र में अनिश्चितता बढ़ती है और लागत पर असर पड़ता है। वहीं, आलोचकों की चिंता राज्यों की वित्तीय और संवैधानिक शक्तियों को लेकर है।
खनिज क्षेत्र में निवेश, महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता और केंद्र-राज्य संबंधों के लिहाज से यह विधेयक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।