मां समझ रही थीं बेटी भारत में है
एशियन गेम्स 2026 में भारत की एथलीट सीमा कुमारी ने ऐसा इतिहास रचा, जिसकी कहानी उनके पदक से भी ज्यादा भावुक है। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के रेटा गांव की रहने वाली सीमा ने जापान के नागोया में महिलाओं की 10,000 मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीता। लेकिन जब वह ट्रैक पर देश के लिए पदक जीत रही थीं, उस समय उनकी 75 वर्षीय मां को यह तक पता नहीं था कि बेटी जापान में है।
सीमा ने बताया कि उनकी मां की उम्र काफी अधिक है और वह बेटी की सुरक्षा को लेकर बहुत चिंतित रहती हैं। इसी वजह से सीमा उन्हें अपनी यात्रा और ट्रेनिंग की पूरी जानकारी नहीं देती थीं। रिपोर्टों के मुताबिक उनकी मां को लगता था कि सीमा भारत में हैं।
10,000 मीटर में कांस्य और 16 साल का इंतजार खत्म
24 सितंबर को नागोया के Mizuho Park Athletic Stadium में सीमा ने 32 मिनट 50.05 सेकंड का समय निकालकर तीसरा स्थान हासिल किया।
बहरीन की Winfred Yavi ने 32:39.18 के समय के साथ स्वर्ण और जापान की Nozomi Tanaka ने 32:41.54 के साथ रजत पदक जीता। सीमा ने कांस्य अपने नाम किया।
इस पदक के साथ भारत का महिलाओं की 10,000 मीटर स्पर्धा में एशियन गेम्स पदक का 16 साल लंबा इंतजार खत्म हुआ। यह 2010 के बाद इस इवेंट में भारत का पहला पदक है।
छोटी जगह से अंतरराष्ट्रीय ट्रैक तक का सफर
सीमा का संबंध हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के छोटे से रेटा गांव से है। उनका परिवार खेती से जुड़ा रहा है और उन्होंने कम उम्र में अपने पिता को खो दिया था।
2015 में धर्मशाला में SAI की योजना के जरिए उन्हें एथलेटिक्स में प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने लंबी दूरी की दौड़ को अपना करियर बनाया और धीरे-धीरे राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई।
2026 में शानदार प्रदर्शन
सीमा ने 2026 सीजन में भी अपनी क्षमता दिखाई थी। मार्च में अमेरिका के California में आयोजित The TEN प्रतियोगिता में उन्होंने 10,000 मीटर में 32:02.43 का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ समय दर्ज किया था।
एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की एशियन गेम्स टीम में भी सीमा को महिलाओं की 5,000 और 10,000 मीटर स्पर्धाओं के लिए शामिल किया गया था।
आखिरी लैप में बढ़ा रोमांच
10,000 मीटर की दौड़ में कुल 25 लैप होते हैं। शुरुआत में रफ्तार अपेक्षाकृत नियंत्रित रही और सीमा पदक की दौड़ में बनी रहीं।
अंतिम चरण में Yavi और Tanaka आगे निकल गईं। सीमा ने भी आखिरी हिस्से में अपनी स्थिति मजबूत रखी और बाकी धावकों को पीछे छोड़ते हुए तीसरा स्थान सुरक्षित किया। इस तरह एशियन गेम्स के अपने पहले ही अभियान में उन्होंने भारत के लिए कांस्य पदक जीत लिया।
पदक के बाद भी आराम नहीं
पदक जीतने के बाद सीमा ने जापान से बातचीत में कहा कि वह आराम करने के बजाय आगे की तैयारी पर ध्यान देना चाहती हैं और देश के लिए और पदक जीतने का लक्ष्य रखती हैं। रिपोर्टों के अनुसार चोट और शारीरिक परेशानियों के बावजूद उन्होंने प्रशिक्षण जारी रखा है।
मां को कब पता चला?
सीमा की जीत के बाद जब बधाइयों का सिलसिला शुरू हुआ और खबरें सामने आईं, तब उनकी मां को पता चला कि बेटी जापान में एशियन गेम्स खेल रही थी।
एक तरफ नागोया के स्टेडियम में सीमा तिरंगे में लिपटी जीत का जश्न मना रही थीं, दूसरी तरफ हिमाचल के उनके घर में मां को बेटी की इस उपलब्धि की खबर मिल रही थी।
सीमा की कहानी क्यों खास है?
सीमा की कहानी सिर्फ एक कांस्य पदक की कहानी नहीं है। यह छोटे गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने, लंबे समय तक प्रशिक्षण करने और दबाव के बीच प्रदर्शन करने की कहानी है।
और सबसे दिलचस्प बात—जिस मां को बेटी के जापान पहुंचने की भनक तक नहीं थी, उसी बेटी ने हजारों किलोमीटर दूर जाकर एशियन गेम्स के ट्रैक पर भारत का झंडा ऊंचा कर दिया।
32:50.05 सेकंड की दौड़ और एक ऐतिहासिक कांस्य—सीमा कुमारी अब भारतीय एथलेटिक्स की उस सूची में शामिल हो गई हैं, जिन्होंने एशियन गेम्स में 10,000 मीटर में भारत का लंबा इंतजार खत्म किया।