निठारी कांड से शुरू हुई करीब दो दशक लंबी कानूनी कहानी

दिसंबर 2006 में नोएडा के निठारी इलाके में एक मकान के आसपास से बच्चों और युवतियों के मानव अवशेष मिलने के बाद देशभर में सनसनी फैल गई थी। इस मामले में मकान मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर और उसके घरेलू सहायक सुरिंदर कोली मुख्य आरोपियों के रूप में सामने आए। बाद में जांच CBI को सौंप दी गई और अलग-अलग पीड़ितों से जुड़े कई मुकदमे चलाए गए।

13 मामलों में मिली थी मौत की सज़ा

कोली के खिलाफ निठारी से जुड़े 13 अलग-अलग आपराधिक मामले चले। इनमें उसे अलग-अलग मौकों पर दोषी ठहराया गया और कुल मिलाकर 13 मामलों में मौत की सज़ा सुनाई गई।

शुरुआती मुकदमों में अभियोजन का आधार मुख्य रूप से दो चीजें थीं—मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कथित इकबालिया बयान और पुलिस द्वारा कोली की निशानदेही पर मानव अवशेष तथा अन्य वस्तुओं की बरामदगी का दावा।

2009 में एक मामले में गाजियाबाद की अदालत ने कोली और पंढेर को दोषी ठहराते हुए मौत की सज़ा सुनाई। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोली की सज़ा बरकरार रखी, जबकि पंढेर को उस मामले में पर्याप्त सबूत न होने के आधार पर राहत मिली। 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने कोली की दोषसिद्धि और मौत की सज़ा को बरकरार रखा।

फिर दया याचिका और मौत की सज़ा पर सवाल

कोली ने राज्यपाल और राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिकाएं दाखिल कीं। 2014 में उसकी फांसी की तारीख भी तय हुई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में आधी रात को हुई सुनवाई के बाद फांसी पर रोक लग गई।

2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दया याचिका पर फैसला लेने में हुई अत्यधिक देरी को देखते हुए उसकी मौत की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया। ध्यान देने वाली बात यह है कि उस समय उसकी दोषसिद्धि खत्म नहीं हुई थी।

2023 में कानूनी कहानी ने लिया बड़ा मोड़

अक्टूबर 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निठारी से जुड़े 12 मामलों में कोली को बरी कर दिया। अदालत ने अभियोजन के सबूतों की विश्वसनीयता और उन्हें कानून के मुताबिक साबित किए जाने पर गंभीर सवाल उठाए।

हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल थे:

  1. क्या कोली का कथित इकबालिया बयान वास्तव में स्वैच्छिक और विश्वसनीय था?
  2. क्या मानव अवशेषों की बरामदगी वास्तव में उसकी विशेष जानकारी के आधार पर हुई थी?
  3. क्या बरामदगी को भारतीय साक्ष्य कानून की धारा 27 के तहत स्वीकार किया जा सकता था?
  4. क्या फॉरेंसिक सबूत कोली को अपराध से सीधे जोड़ते थे?
  5. क्या परिस्थितिजन्य सबूतों की पूरी कड़ी दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त थी?

अदालत ने पाया कि अभियोजन इन सवालों का भरोसेमंद जवाब देने में विफल रहा। हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि कथित बरामदगी जिस खुले इलाके से हुई, वह कोली के विशेष या exclusive कब्जे में नहीं था। अदालत ने इकबालिया बयान और बरामदगी की प्रक्रिया में भी कई विसंगतियां देखीं।

सुप्रीम कोर्ट ने भी 12 मामलों में बरी होने का फैसला बरकरार रखा

CBI और पीड़ित पक्षों की ओर से हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। 30 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अपीलें खारिज कर दीं। इस तरह 12 मामलों में कोली की बरी होने की स्थिति बरकरार रही।

लेकिन इसके बावजूद एक मामला बाकी था।

एक केस ने कोली को जेल में रोके रखा

कोली के खिलाफ 13वां और अंतिम मामला एक नाबालिग लड़की से जुड़े कथित बलात्कार और हत्या का था। इसी मामले में उसकी दोषसिद्धि पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी बरकरार रखी जा चुकी थी।

यहीं से कानूनी स्थिति बेहद महत्वपूर्ण हो गई—12 मामलों में जिस तरह के सबूतों को अदालतें अविश्वसनीय या कानूनी रूप से अपर्याप्त मान चुकी थीं, लगभग उसी evidentiary foundation पर एक मामले में कोली की दोषसिद्धि बनी हुई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने Curative Petition क्यों स्वीकार की?

कोली ने सुप्रीम कोर्ट में curative petition दाखिल की। यह सामान्य अपील या review petition के बाद उपलब्ध बेहद सीमित कानूनी उपाय है, जिसका उद्देश्य असाधारण परिस्थितियों में गंभीर न्यायिक त्रुटि को ठीक करना है।

11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने उसकी curative petition स्वीकार कर ली और अंतिम मामले में भी उसे बरी कर दिया। कोर्ट ने पहले की दोषसिद्धि और उससे जुड़े आदेशों को वापस लेते हुए तत्काल रिहाई का आदेश दिया।

कोर्ट ने सबूतों में क्या खामियां पाईं?

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, पहले वाले मामले में जिस इकबालिया बयान और बरामदगी को दोषसिद्धि का आधार बनाया गया था, उसी प्रकार के सबूतों को बाद के 12 मामलों में अदालतें अविश्वसनीय मान चुकी थीं।

अदालत ने जांच में कई कमियां भी गिनाईं—जैसे अपराध स्थल को पर्याप्त रूप से सुरक्षित किए बिना खुदाई, पुलिस हिरासत और रिमांड रिकॉर्ड में विसंगतियां तथा फॉरेंसिक सबूतों की सीमाएं। कोर्ट ने यह भी कहा कि फॉरेंसिक जांच से पीड़ितों की पहचान से जुड़ी जानकारी मिल सकती थी, लेकिन इससे जरूरी तौर पर कोली को अपराध से जोड़ना साबित नहीं होता था।

सुप्रीम कोर्ट ने मूल रूप से यह माना कि गंभीर संदेह अपने आप में आपराधिक दोषसिद्धि का विकल्प नहीं हो सकता; अपराध को कानूनी मानक यानी reasonable doubt से परे साबित करना जरूरी है।

'बरी' होने का मतलब क्या है?

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। अदालत द्वारा बरी किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने किसी दूसरे व्यक्ति को अपराधी घोषित कर दिया या यह निश्चित रूप से साबित हो गया कि घटना हुई ही नहीं।

इसका कानूनी अर्थ यह है कि अभियोजन उपलब्ध सबूतों के आधार पर आरोपी का अपराध कानून में आवश्यक मानक तक साबित नहीं कर पाया।

नवंबर 2025 के फैसले के बाद कोली के खिलाफ निठारी से जुड़े सभी 13 मामलों में दोषसिद्धि समाप्त हो गई और उसे रिहा करने का आदेश दिया गया।

करीब 20 साल बाद जेल से बाहर आया

सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के बाद कोली नवंबर 2025 में जेल से बाहर आया। इस तरह जिस व्यक्ति को कभी निठारी के मामलों में 13 बार मौत की सज़ा सुनाई गई थी, उसकी कानूनी स्थिति अंततः सभी 13 मामलों में acquittal की हो गई।

यह कहानी भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को भी सामने लाती है—दोष साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की होती है और केवल गंभीर आरोप या संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।