टाटा ग्रुप के भीतर टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच बढ़ता विवाद अब कानूनी लड़ाई की दिशा में जाता दिखाई दे रहा है। इस विवाद में देश के दो प्रमुख वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और हरीश साल्वे अलग-अलग पक्षों के कानूनी नजरिए सामने रख रहे हैं। सिंघवी टाटा ट्रस्ट्स का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जबकि साल्वे टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के कानूनी सलाहकार हैं।
विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
विवाद का तत्काल केंद्र एन. चंद्रशेखरन की टाटा संस के चेयरमैन के रूप में दोबारा नियुक्ति है। 17 सितंबर 2026 को टाटा संस के बोर्ड ने चंद्रशेखरन को एक और पांच साल के कार्यकाल के लिए फिर से नियुक्त करने का प्रस्ताव पारित किया।
टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। ट्रस्ट्स का कहना है कि टाटा संस के Articles of Association के तहत चेयरमैन की नियुक्ति के लिए ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टर्स की आवश्यक सहमति जरूरी थी और यह शर्त पूरी नहीं हुई।
टाटा ट्रस्ट्स ने बोर्ड के फैसले को “कानूनी रूप से अमान्य” बताया है। यह ट्रस्ट्स का पक्ष है; दूसरी ओर टाटा संस की ओर से बोर्ड के फैसले का बचाव किया जा रहा है।
सिंघवी का क्या तर्क है?
अभिषेक मनु सिंघवी टाटा ट्रस्ट्स की ओर से इस मामले में पैरवी कर रहे हैं। उनका मुख्य तर्क है कि टाटा संस में ट्रस्ट्स की लगभग 66% हिस्सेदारी को देखते हुए उनके शेयरहोल्डर अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सिंघवी ने कहा है कि मामला केवल नोएल टाटा और चंद्रशेखरन के बीच व्यक्तिगत विवाद नहीं है, बल्कि यह शेयरहोल्डर अधिकारों और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़ा बड़ा सवाल है। उन्होंने यह भी कहा कि परिस्थितियां कानूनी लड़ाई की ओर बढ़ती दिख रही हैं।
साल्वे का पक्ष क्या है?
दूसरी ओर, वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे, जो चंद्रशेखरन के कानूनी सलाहकार हैं, बोर्ड के फैसले का अलग कानूनी नजरिए से बचाव कर रहे हैं।
साल्वे का तर्क है कि बोर्ड की बैठक में ट्रस्ट्स के दो नॉमिनी डायरेक्टर्स के बीच मतभेद पैदा होने के बाद चेयरमैन के casting vote का इस्तेमाल वैध तरीके से किया गया। उनके मुताबिक अगर ऐसी स्थिति में गतिरोध बना रहता, तो कंपनी का कामकाज प्रभावित हो सकता था।
साल्वे ने विवाद के बीच टाटा संस की प्रस्तावित लिस्टिंग और RBI से जुड़े नियामकीय मुद्दों को भी महत्वपूर्ण बताया है। उनका कहना है कि चेयरमैन की नियुक्ति के विवाद से अलग टाटा संस की लिस्टिंग का सवाल भी कंपनी के लिए महत्वपूर्ण है।
कास्टिंग वोट बना कानूनी विवाद का केंद्र
पूरे विवाद में एक अहम सवाल casting vote को लेकर है। टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि चेयरमैन का casting vote तभी लागू हो सकता है जब पूरे बोर्ड के स्तर पर वोट बराबर हों। ट्रस्ट्स के मुताबिक दो Trust nominee directors के बीच मतभेद को casting vote से नहीं सुलझाया जा सकता।
इस मामले में पूर्व CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ की कानूनी राय का भी उल्लेख हुआ है। ट्रस्ट्स के अनुसार उनकी राय में nominee directors की सहमति की आवश्यकता अलग और स्वतंत्र शर्त है। हालांकि, यह एक कानूनी राय है और अंतिम न्यायिक निर्णय नहीं।
कभी दोनों एक ही पक्ष में थे
इस विवाद को इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि साल्वे और सिंघवी पहले टाटा-साइरस मिस्त्री विवाद में टाटा समूह से जुड़े पक्षों के लिए साथ दिखाई दिए थे। मौजूदा विवाद में दोनों अलग-अलग पक्षों के कानूनी नजरिए रख रहे हैं।
अब आगे क्या?
टाटा ट्रस्ट्स पहले ही चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के बोर्ड प्रस्ताव को चुनौती देने की स्थिति स्पष्ट कर चुका है। ऐसे में यदि मामला औपचारिक कानूनी प्रक्रिया में जाता है, तो अदालत के सामने मुख्य सवालों में Tata Sons के Articles of Association, Trust nominee directors की भूमिका, casting vote की वैधता और shareholder rights शामिल हो सकते हैं।
फिलहाल किसी अदालत ने इस विवाद पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। इसलिए चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर दोनों पक्षों के कानूनी तर्कों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
टाटा ग्रुप का यह विवाद अब सिर्फ बोर्डरूम तक सीमित नहीं दिख रहा है—इसके केंद्र में कंपनी के नियंत्रण, शेयरहोल्डर अधिकारों और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सवाल हैं।